एक किसान एक किलो गेहूं पैदा करने के लिए महीनों मेहनत करता है—जमीन तैयार करता है, बीज और खाद डालता है, सिंचाई करता है और मौसम की मार झेलता है। फिर भी उसे अपनी उपज का सीमित मूल्य मिलता है। दूसरी ओर, वही गेहूं जब साफ होकर, प्रोसेस होकर दलिया, आटा, बिस्किट या अन्य पैक्ड खाद्य उत्पाद बनता है, तो उसकी कीमत कई गुना बढ़ जाती है।
यही वैल्यू एडिशन (Value Addition) का अंतर है।
किसान गेहूं बेचता है, जबकि प्रोसेसर और ब्रांड उसी गेहूं को एक उत्पाद, पैकेज और पहचान के साथ बेचते हैं। ग्राहक केवल गेहूं के लिए नहीं, बल्कि उसकी सफाई, गुणवत्ता, पैकेजिंग, सुविधा, ब्रांड और भरोसे के लिए भी भुगतान करता है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि किसान कितना उत्पादन करता है, बल्कि यह है कि उत्पादन के बाद मिलने वाली कमाई की कितनी सीढ़ियां किसान के पास रहती हैं।
किसान यदि खेती के साथ प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और सीधे बाजार से जुड़ जाए, तो उसकी आय में बड़ा बदलाव आ सकता है।




